अपनेपन की तलाश

यह दुनिया बहुत बड़ी है । लेकिन इसका एक हिस्सा मैं भी हुँ । हाँ इतना बड़ा नाम न सही की हर कोई मुझे जानता हो लेकिन मेरा अस्तित्व जरूर है । क्योंकि ये मेरी दुनिया है । फिर भी इस दुनिया से ही अंजान हूँ मैं नही पता क्या होने वाला है क्या होजाएगा । ” आज है कोई इधर , न जाने कल किधर खो जाएगा ” अपनी तोह न कोई मंजिल है ना कोई ठिकाना फिर भी तुमको पाने को मेरा दिल दूर दुनिया से भी तुमको ढूंढता हुआ आएगा ।।

लेकिन किसको ढूंढ रहा है ये दिल ।

खैर यही बात सोच रहा हूँ मैं । जबसे पैदा हुआ तबसे कुछ न कुछ पाने को भटक रहा हुँ । शुरू से याद करू तो …

  • स्कूल में लगा कि अच्छे चरित्र को पाना मेरी मंजिल है , बड़ो का कहना मानना मेरा परम धर्म है , सबसे प्यार से बात करना ही मेरी पहचान है , सबके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना ही मूझको मुझसा बना कर रखेगा । यही सब धर्म है यही सब है जो हमें इंसान बनाता है ।
  • लेकिन जब मैं बोर्ड की कक्षा में पहुंचा तो मुझे सिखाया गया कि सबके साथ चलोगे तोह जीवन में सफल नही हो पाओगे , तुमको दौड़ना है सबसे तेज़ दौड़ना है , और इस रफ्तार से आगे जाना है कि कोई तुम्हारे साथ कदम न मिला पाए , तुमको किसी की परवाह नही करनी तुमको सिर्फ अपनी परीक्षा पर ध्यान केंद्रित करना है , हर उन इच्छाओं को छोड़ देना है तुमको जिससे तुम्हे लगे कि तुम अच्छे परिणाम परीक्षा में नही ला पाओगे । हर वो बात जो स्कूल में सीखी अस्तित्व उनका यहां आकर खत्म होने लगा था । 
  • जब कॉलेज पहुंचा तो जाना कि एक अच्छी नौकरी पाना ही उद्देश्य है हमारा , या फिर एक ऐसी उपादि 

कायरता !!

साहसी नहीं हूँ मैं बहुत बड़ा कायर हुँ । शायद आप सब सोचेंगे की यह क्या बात हुई अपने बारे में पहली बार बता रहा है और शुरुआत कर रहा है अपने आप को कायर बताने से । तो आप कुछ गलत नही सोच रहे क्योंकि मैं हमेशा बचता आया हूँ , डरता आया हुँ की लोग क्या कहेंगे – क्या सोचेंगे भले ही मैं खुदको कितना मर्द बता लू लेकिन अंदर ही अंदर एक डर हमेशा रहा है मुझमें कि कहीं मैं इस दुनिया की भीड़ में कहीं खो ना जाऊँ । कहीं लोग मेरी सादगी मेरे प्यार को भूल न जाय । कहीं मैं उनको खो ना दु जिनको मैंने खुद से ज्यादा समय दिया लेकिन सच बताऊ इस 23 साल में से 13 साल सिर्फ मैंने डर के गुजार दिए ।

डर अध्यापक की मार का 

डर पिता की फटकार का

डर दोस्तों के व्यवहार का

डर अपने संस्कार का

डरता रहा धर्म से , डरता रहा भ्रम से , सबने कहा संभाल के चलो तो डरता रहा हर कदम से । तुम ही बताओ यह धर्म यह संस्कार किस नाम के जो मझे मुझसे दूर करते रहे । जिन्होंने मुझे मुझसे मिलने की जगह मुझसे खुदको दूर करने का राह दिखाई । 

हाँ!!  मैं दिल से नहीं मानता इन सबको लेकिन फिर भी डर के आज भी झुका देता हूँ मस्तक मेरा । 

क्या इतना काफी नही है । 

अक्सर मैं ये बात खुदसे पूछता हूँ कि क्या इतना काफी नहीं है जो तुम अब सब जानकर भी डरे जा रहे हो । तोह कोई आवाज़ मुझ तक नही पहुँचती । पहुँचता है तो एक डर की कहीं कुछ आगे गलत ना होजाए , कहीं कोई अनर्थ अब इस समय जब मेरे शरीर में जान नही है कुछ सहने कुछ कहने की ना होजाए ।

हाँ !! मैं कायर हुँ क्योंकि मैं सबकुछ जानकर भी कुछ नही कर सकता । इस दुनिया के लोगों की तुच्छ सोच बदलने की हिम्मत मुझमें नहीं है , तोह हाँ ! मैं सिर्फ और सिर्फ कायर कहलाने के लायक हुँ । इसमें मुझे बोलते हुए कोई शर्म नही आती । जब तक इंसान खुदको यूँही खोखले विचारो से भरता रहेगा वो कभी साहसी नहीं बन सकता । 

जरूरत है हमको अपनी कायरता को पहचानने का ।

जरूरत है अपनी कायरता का साहस से सामना करने का ।

जरूरत है हमको जब कुछ गलत होता दिखे तो उसका विरोध करने का ।

और जब तक हम ये सब नही कर सकते , तब तक आपको और मुझे खुदको साहसी बोलने का कोई हक नही ।।

तब तक आप और मैं सिर्फ एक कायर है ।